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S.no. 1  |  shpid: 1 |  id: 19 |  shlok#: 1 | utid: 2
   verse_a: धृतराष्ट्र उवाच
   verse_b: धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे सम-वेता यु-युत त्सवः।
   verse_c: माम-काहव् पाण्डवाश्चैव किम-कुर्वत सञ्जय ।।1.1।।

S.no. 2  |  shpid: 1 |  id: 45 |  shlok#: 30 | utid: 2
   verse_a: गाण्डी वं स्रम सते हस्तात  त्वक  चैव परि - धह यते ।
   verse_b: न च शक्नो - मय - वस्था - तुं भ्रम तीव च मे मनः ॥1.30

S.no. 3  |  shpid: 1 |  id: 46 |  shlok#: 31 | utid: 2
   verse_a: निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
   verse_b: न च श्रेयो नु पश्यामि हत्वा स्वजन माहवे ॥1.31

S.no. 4  |  shpid: 1 |  id: 47 |  shlok#: 32 | utid: 2
   verse_a: न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
   verse_b: किं नो राज्येन गोविंद किं भोगै र र्जीवितेन वा ॥1.32

S.no. 5  |  shpid: 1 |  id: 48 |  shlok#: 33 | utid: 2
   verse_a: येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
   verse_b: त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणां स्त्यक त्वा धनानि च ॥1.33

S.no. 6  |  shpid: 1 |  id: 49 |  shlok#: 34 | utid: 2
   verse_a: आचार्याः पितरः पुत्रास् तथैव च पितामहाः ।
   verse_b: मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधि नस्तथा ॥1.34

S.no. 7  |  shpid: 1 |  id: 50 |  shlok#: 35 | utid: 2
   verse_a: एतान्न न हन्तु मिच्छामि घ्नतो पि मधुसूदन ।
   verse_b: अपि त्रैलोक्य राज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥1.35

S.no. 8  |  shpid: 1 |  id: 51 |  shlok#: 36 | utid: 2
   verse_a: निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीतिः स्याज जनार्दन ।
   verse_b: पाप मेवा श्रये दस्मान्‌ हत्वै ताना त तायिनः ॥1.36

S.no. 9  |  shpid: 1 |  id: 52 |  shlok#: 37 | utid: 2
   verse_a: तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान न्स्व बान्धवान्‌ ।
   verse_b: स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥1.37

S.no. 10  |  shpid: 1 |  id: 53 |  shlok#: 38, 39 | utid: 2
   verse_a: यद्यप्ये तेन पश्यन्ति लोभो पहत चेतसः ।
   verse_b: कुलक क्षय कृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌ ॥1.38
   verse_c: कथं न ज्ञेय मस्माभिः पापा दस्मान्नि वर्तितुम्‌ ।
   verse_d: कुलक क्षय कृतं दोषं प्रपश्य द्भि र्जनार्दन ॥1.39

S.no. 11  |  shpid: 1 |  id: 54 |  shlok#: 40 | utid: 2
   verse_a: कुलक्षये प्रण श्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
   verse_b: धर्मे नष्टे कुलं कृत् सनम अधर्मोऽ भि भवत त्युत ॥1.40

S.no. 12  |  shpid: 1 |  id: 55 |  shlok#: 41 | utid: 2
   verse_a: अधम र्माभि भवा त्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
   verse_b: स्त्रीषु दुष्टा सु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥1.41

S.no. 13  |  shpid: 1 |  id: 56 |  shlok#: 42 | utid: 2
   verse_a: संकरो नर कायै व कुलघ् नानां कुलस्य च ।
   verse_b: पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डो दक क्रियाः ॥1.42

S.no. 14  |  shpid: 1 |  id: 57 |  shlok#: 43 | utid: 2
   verse_a: दोषैरेतैः कुलघ् नानां वर्ण संकर कारकैः ।
   verse_b: उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥1.43

S.no. 15  |  shpid: 1 |  id: 58 |  shlok#: 44 | utid: 2
   verse_a: उत्सन्न कुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
   verse_b: नरकेऽनियतं वासो भवती त्यनु शुश्रुम ॥1.44

S.no. 16  |  shpid: 1 |  id: 59 |  shlok#: 45 | utid: 2
   verse_a: अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌ ।
   verse_b: यद्रा ज्यसुख लोभेन हन्तुं स्वजन मुद्यताः ॥1.45

S.no. 17  |  shpid: 1 |  id: 60 |  shlok#: 46 | utid: 2
   verse_a: यदि मामप्रतीकारम अशस्त्रं शस्त्र पाणयः ।
   verse_b: धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस तन्मे क्षेम तरं भवेत्‌ ॥1.46

S.no. 18  |  shpid: 1 |  id: 61 |  shlok#: 47 | utid: 2
   verse_a: संजय उवाच
   verse_b: एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथो पस्थ उपा विशत्‌ ।
   verse_c: वि-सृज्य स-शरं चापं शोक संविग्न मानसः ॥1.47

S.no. 19  |  shpid: 2 |  id: 20 |  shlok#: 2 | utid: 2
   verse_a: सञ्जय उवाच
   verse_b: दृष्ट्वा तु पाण्डवा-नीकंम व्यूढंम दुर्यो-धनस्तदा।
   verse_c: आचार्य-मुप- सम-गम-य राजा वचन-मब-ब्रवीत् ।।1.2।।

S.no. 20  |  shpid: 3 |  id: 21 |  shlok#: 3 | utid: 2
   verse_a: पश्यैताम पाण्डु-पुत्राणाम - आचार्य महतीं चमूम्।
   verse_b: व्यूढाम द्रुपद-पुत्रेण तव शिष्ये-ण धीमता ।।1.3।।

S.no. 21  |  shpid: 4 |  id: 22 |  shlok#: 4 | utid: 2
   verse_a: अत्र शूरा महेष्वासा ह भीमार्जुन समा युधि।
   verse_b: युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ।।1.4।।

S.no. 22  |  shpid: 5 |  id: 23 |  shlok#: 5 | utid: 2
   verse_a: धृष्टकेतु-श-चेकितानः काशिराजश च वीर्यवान्।
   verse_b: पुरुजित कुन्तिभोजश्च शैब ब्यश-चह नरपुंग वह् ।।1.5।।

S.no. 23  |  shpid: 6 |  id: 24 |  shlok#: 6 | utid: 2
   verse_a: युधा-मन्युश्च विक्रान्त ह उत्तमौ-जा-शच वीर्यवान्।
   verse_b: सौभद्रो द्रौपदे-याश्-च सर्व एव महारथाः ।।1.6।।

S.no. 24  |  shpid: 7 |  id: 25 |  shlok#: 7 | utid: 2
   verse_a: अस्मा-कंतु विशिष्टा-ये तान्निबोध द्वि-जोत्तम ।
   verse_b: नाय-का मम सैन्यस्य सम-ज्ञारर्थम तान ब्रवी-मिते ॥ 1.7 ||

S.no. 25  |  shpid: 8 |  id: 26 |  shlok#: 8 | utid: 2
   verse_a: भवान् - भीष्म - श्च कर्णश्च कृपश्च समितिन जयः ।
   verse_b: अश्वत्थामा विकर्णश्च सौम-द- दत्तिस्तथैव च ॥ 1.8

S.no. 26  |  shpid: 9 |  id: 27 |  shlok#: 9 | utid: 2
   verse_a: अन्ये च बहवः शूरा ह मदर्थे त्यक्त - जीविताः ।
   verse_b: नानाशस्त्र-प्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥1.9

S.no. 27  |  shpid: 10 |  id: 28 |  shlok#: 10 | utid: 2
   verse_a: अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ ।
   verse_b: पर्याप्तं त्विद-मे-तेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥1.10

S.no. 28  |  shpid: 11 |  id: 29 |  shlok#: 11 | utid: 2
   verse_a: अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
   verse_b: भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व ए-वहि ॥1.11

S.no. 29  |  shpid: 12 |  id: 30 |  shlok#: 12 | utid: 2
   verse_a: तस्य सञ्जन-यन-न्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
   verse_b: सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌ ॥1.12

S.no. 30  |  shpid: 13 |  id: 31 |  shlok#: 13 | utid: 2
   verse_a: ततः शंखाश्च भेर्यश्च पण-वानक-गोमुखाः ।
   verse_b: सहसैवा- भय-हन्यन्त स शब्द दस तुमुलोऽ भवत्‌ ॥1.13

S.no. 31  |  shpid: 14 |  id: 32 |  shlok#: 14 | utid: 2
   verse_a: ततः श्वेतयर् ह हर्य युक्ते महति ईस्यं न्दने स्थितौ ।
   verse_b: माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध् मतुः ॥1.14

S.no. 32  |  shpid: 15 |  id: 33 |  shlok#: 15 | utid: 2
   verse_a: पाञ्च-जन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
   verse_b: पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः ॥1.15

S.no. 33  |  shpid: 16 |  id: 34 |  shlok#: 16 | utid: 2
   verse_a: अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
   verse_b: नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥1.16

S.no. 34  |  shpid: 17 |  id: 35 |  shlok#: 17 | utid: 2
   verse_a: काश्-यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
   verse_b: धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्य-किश्चापराजितः ॥1.17

S.no. 35  |  shpid: 18 |  id: 36 |  shlok#: 18 | utid: 2
   verse_a: द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
   verse_b: सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌ ॥1.18

S.no. 36  |  shpid: 19 |  id: 37 |  shlok#: 19 | utid: 2
   verse_a: स घोषो धार्त राष्ट्राणां हृदयानि व्य दा रयत्‌ ।
   verse_b: नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनु ना दयन्‌ ॥1.19

S.no. 37  |  shpid: 20 |  id: 38 |  shlok#: 20 | utid: 2
   verse_a: अथ व्यवस्थि तान् दृष्ट्वा धार्त राष्ट्रान्‌ कपिध्वजः ।
   verse_b: प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरु द्यम्य पाण्डवः ॥ 1.20
   verse_c: हृषीकेशं तदा वाक्य-मिदमाह महीपते ।

S.no. 38  |  shpid: 21 |  id: 39 |  shlok#: 21, 22 | utid: 2
   verse_a: अर्जुन उवाचः
   verse_b: सेन यो रुभ योर्म मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ 1.21
   verse_c: या व देता न्निरीक्षेऽहं यो द्धुका मान वस्थितान्‌ ।
   verse_d: कैर्म मया सह यो धद्धव्यम अमस्मिन् रण समुद्यमे ॥1.22

S.no. 39  |  shpid: 22 |  id: 40 |  shlok#: 23 | utid: 2
   verse_a: योत्स्य माना नवेक्षेऽहं य ए तेऽत्र समागताः ।
   verse_b: धार्त राष्ट्रस्य दुर्बुद्धे र्युद्धे प्रिय चिकी र्षवः ॥1.23

S.no. 40  |  shpid: 23 |  id: 41 |  shlok#: 24, 25 | utid: 2
   verse_a: संजय उवाच
   verse_b: एवमुक्तो हृषीकेशोह गुडाके-शेन भारत ।
   verse_c: सेन योरु भयोर्मध्ये स्थाप यित्वा रथोत्तमम्‌ ॥1.24
   verse_d: भीष्म द्रोण प्रमुखतः सर्वेषां च मही क्षिताम्‌ ।
   verse_e: उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ सम वेतान्‌ कुरूनिति ॥1.25

S.no. 41  |  shpid: 24 |  id: 42 |  shlok#: 26 | utid: 2
   verse_a: तत्र अपश्यत् स्थितान् पार्थः पितृ नथ पिता महान्‌ ।
   verse_b: आचार्यान मातुलान भ्रातृन पुत्रान पोत्राण सखीम स्तथा ॥ 1.26
   verse_c: शवशु रान्‌ सु हृदय चैवह सेन-यो-रु-भयोरपि ।

S.no. 42  |  shpid: 25 |  id: 43 |  shlok#: 27 | utid: 2
   verse_a: तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धू - न - वस्थितान्‌ | 1.27॥
   verse_b: कृपया परयाविष्टो विषी - दत्रि - द - मब - ब्रवीत्‌ ।

S.no. 43  |  shpid: 26 |  id: 44 |  shlok#: 28, 29 | utid: 2
   verse_a: अर्जुन उवाच
   verse_b: दृष्टे-वमं स्वजनं कृष्ण युयुत सूम स-मुप-स्थितम्‌ ॥ 1.28
   verse_c: सी-दन्ति मम गात्राणि मुखं च परि-शुष्यति ।
   verse_d: वेप थुश च शरीरे में रोमहर्ष - शच - जायते ॥1.29