main page
topic list
final sample view of verse
add topics
add verse in specific topic
Received ID: 3



S.no. 1  |  shpid: 1 |  id: 62 |  shlok#: 1 | utid: 3
   verse_a: संजय उवाच
   verse_b: तं तथा कृपयाविष्टम अश्रु पूर्णा कुलेक्षणम्‌ ।
   verse_c: विषीदन्त मिदं वाक्यमु उवाच मधुसूदनः ॥ 2.1 ॥

S.no. 2  |  shpid: 2 |  id: 63 |  shlok#: 2 | utid: 3
   verse_a: श्रीभगवानुवाच
   verse_b: कुत स्त्वा कश्मल मिदं विष-मे स-मुपस्थितम्‌ ।
   verse_c: अनार्य जुष्ट म स्वर्ग्यम अकीर्तिकर मर्जुन॥ 2.2 ॥

S.no. 3  |  shpid: 3 |  id: 64 |  shlok#: 3 | utid: 3
   verse_a: क्लैब्यं मा  इस-मगमह पार्थ *  नैइ- त-त्त्वय य्युप पद्यते ।
   verse_b: क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं त्यक्त्वो त्तिष्ठ परन्तप ॥ 2.3 ॥

S.no. 4  |  shpid: 4 |  id: 65 |  shlok#: 4 | utid: 3
   verse_a: अर्जुन उवाच
   verse_b: कथं भीष्म महं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
   verse_c: इषुभिः प्रति (योत्स सा मी )योत्स्यामि (पूजार हा )पूजार्हा  वरिसूदन ॥ 2.4 ॥

S.no. 5  |  shpid: 5 |  id: 66 |  shlok#: 5 | utid: 3
   verse_a: गुरू-न-हत्वा हि महानु भा-वान् * श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्य-मपी-ह लोके । 
   verse_b: हत्वार्थ-का-मांस्तु गुरू-निहैव * भुञ्जीय भोगान् रुधिर-प्र-दिग्धान् ।। 2.5 ।।

S.no. 6  |  shpid: 6 |  id: 67 |  shlok#: 6 | utid: 3
   verse_a: न (चैत द्विद मह )चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो * यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
   verse_b: यानेव हत्वा न जिजी-विषामस् * तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ 2.6 ॥

S.no. 7  |  shpid: 7 |  id: 68 |  shlok#: 7 | utid: 3
   verse_a: कार्पण्य-दोषो-पहत-स्वभावः * पृच्छामि त्वां धर्म-सम्मूढ-चेताः ।
   verse_b: (यच छेर्य) यच्छ्रेयः स्या न्निश्चितं ब्रूहि तन्मे * शिष्य-स्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌ ॥ 2.7 ॥

S.no. 8  |  shpid: 8 |  id: 69 |  shlok#: 8 | utid: 3
   verse_a: न हि प्रपश्यामि म माप नुद्या-(यच्छो) द्यच्छो-कमुच्छो-षण-मिन्द्रियाणाम्‌ ।
   verse_b: अवाप्य भूमा वस पत्र मृद्धं-राज्यं सुराणा मपि चाधि पत्यम्‌ ॥ 2.8 ॥

S.no. 9  |  shpid: 9 |  id: 70 |  shlok#: 9 | utid: 3
   verse_a: संजय उवाच
   verse_b: एवमुक्त्वा हृषीकेशं * गुडाकेशः परन्तप ।
   verse_c: न योत्स्य इति गोविन्दम * उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ 2.9 ॥

S.no. 10  |  shpid: 10 |  id: 71 |  shlok#: 10 | utid: 3
   verse_a: तमुवाच हृषीकेशः * प्रह-सन्निव भारत ।
   verse_b: सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ॥ 2.10 ॥

S.no. 11  |  shpid: 11 |  id: 72 |  shlok#: 11 | utid: 3
   verse_a: श्री भगवानुवाच
   verse_b: अ शोच्या नन्वशोचस स्त्वं * प्रज्ञा वादांश्च भाषसे ।
   verse_c: गता सून गतासूंश्च * नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ 2.11 ॥

S.no. 12  |  shpid: 12 |  id: 73 |  shlok#: 12 | utid: 3
   verse_a: न त्वे वाहं जातु नासं * न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
   verse_b: न चैव न भविष्यामः * सर्वे वयम तः परम्‌ ॥ 2.12 ॥

S.no. 13  |  shpid: 13 |  id: 74 |  shlok#: 13 | utid: 3
   verse_a: देहिनोऽस्मिन्यथा देहे * कौमारं यौवनं जरा ।
   verse_b: तथा देहान्त रप्राप्ति र्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ 2.13 ॥

S.no. 14  |  shpid: 14 |  id: 75 |  shlok#: 14 | utid: 3
   verse_a: मात्रा स्प(र) र्शास्तु कौन्तेय * शीतोष्ण सुख दुःख दाः ।
   verse_b: आगमा पायिनोऽनित्या(स) * स्तांस्ति-तिक्षस्व भारत ॥ 2.14 ॥

S.no. 15  |  shpid: 15 |  id: 76 |  shlok#: 15 | utid: 3
   verse_a: यं हि न व्य थय (न ) न्त्येते (त्येते ) * पुरुषं पुरु ष र्षभ ।
   verse_b: सम दुःख सुखं धीरं * सोऽमृ-तत्वाय कल्पते ॥ 2.15 ॥

S.no. 16  |  shpid: 16 |  id: 77 |  shlok#: 16 | utid: 3
   verse_a: ना-सतो विद्यते भावो * नाभावो विद्यते सतः ।
   verse_b: उभ-योरपि दृष्टोऽन्तस - त्वनायो(स)-तत्वदर्शिभिः ॥ 2.16 ॥

S.no. 17  |  shpid: 17 |  id: 78 |  shlok#: 17 | utid: 3
   verse_a: अविनाशि तु त द्विद्धि * येन सर्व मिदं ततम्‌ ।
   verse_b: विनाश मव्य यस्यास्य * न कश्चित्क-र्तुमर्हति ॥ 2.17 ॥

S.no. 18  |  shpid: 18 |  id: 79 |  shlok#: 18 | utid: 3
   verse_a: अन्त वन्त इमे देहा * नित्य स्योक्ताः शरीरिणः ।
   verse_b: अनाशिनोऽप्रमेय (य)स्य * तस्मा द्युध्यस्व भारत ॥ 2.18 ॥

S.no. 19  |  shpid: 19 |  id: 80 |  shlok#: 19 | utid: 3
   verse_a: य एनं वेत्ति हन्तारं * यश्चैनं मन्यते हतम्‌ ।
   verse_b: उभौ तौ न विजानीतो * नायं हन्ति न हन्यते ॥ 2.19 ॥

S.no. 20  |  shpid: 20 |  id: 81 |  shlok#: 20 | utid: 3
   verse_a: न जायते म्रिय-ते वा कदाचिन्ना * नयाम भूत्वा भविता वा न भूयः ।
   verse_b: अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो * न हन्यते  हन्यमाने शरीरे ॥ 2.20 ॥

S.no. 21  |  shpid: 21 |  id: 82 |  shlok#: 21 | utid: 3
   verse_a: वेदाविनाशिनं नित्यं * य एन मज मव्य यम्‌ ।
   verse_b: कथं स पुरुषः पार्थ * कं घा तयति हन्ति कम्‌ ॥ 2.21 ॥

S.no. 22  |  shpid: 22 |  id: 83 |  shlok#: 22 | utid: 3
   verse_a: वासांसि जीर्णानि यथा विहाय * नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
   verse_b: तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि(अन्यान्नी) संया ति नवानि देही ॥ 2.22 ॥

S.no. 23  |  shpid: 23 |  id: 84 |  shlok#: 23 | utid: 3
   verse_a: नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
   verse_b: न चैनं क्ले दयन्त्यापो न शोष यति मारुतः ॥ 2.23 ॥

S.no. 24  |  shpid: 24 |  id: 85 |  shlok#: 24 | utid: 3
   verse_a: अच्छेद्योऽ - य-मदाह्योऽयम * (अ)क्लेद्योऽशोष्य एव च ।
   verse_b: नित्यः सर्वगतः स्थाणुर * (अ)चलोऽयं सनातनः ॥ 2.24 ॥

S.no. 25  |  shpid: 25 |  id: 86 |  shlok#: 25 | utid: 3
   verse_a: अव्यक्तोऽ यम चिन्त्योऽयम*(अ)विकार्योऽयमुच्यते ।
   verse_b: तस्मादेवं विदित्वैनं * नानु शोचि तु-मर्हसि॥ 2.25 ॥

S.no. 26  |  shpid: 26 |  id: 87 |  shlok#: 26 | utid: 3
   verse_a: अथ चैनं नित्यजातं * नित्यं वा मन्य से मृतम्‌ ।
   verse_b: तथापि त्वं महाबाहो * नैवं शो चि तु-मर्हसि ॥ 2.26 ॥

S.no. 27  |  shpid: 27 |  id: 88 |  shlok#: 27 | utid: 3
   verse_a: जातस्त हि ध्रुवो मृत्यु * र्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
   verse_b: तस्माद-परिहार्येऽर्थे * न त्वं शोचितु-मर्हसि ॥ 2.27 ॥

S.no. 28  |  shpid: 28 |  id: 89 |  shlok#: 28 | utid: 3
   verse_a: अव्यक्ता-दीनि भूतानि * व्यक्त-मध्यानि भारत ।
   verse_b: अव्यक्त-नि-धनान्येव * तत्र का परिदेवना ॥ 2.28 ॥

S.no. 29  |  shpid: 29 |  id: 90 |  shlok#: 29 | utid: 3
   verse_a: आश्चर्य-वत्पश्यति कश्चिदेन(म)-आश्चर्य-वद्व-दति तथैव चान्यः ।
   verse_b: आश्चर्य-वच्चै-नमन्यः श्रृणोति * श्रुत्वा-प्येनं वेद न चैव कश्चित्‌ ॥ 2.29 ॥

S.no. 30  |  shpid: 30 |  id: 91 |  shlok#: 30 | utid: 3
   verse_a: देही नित्य-म-वध्योऽयं * देहे सर्वस्य भारत ।
   verse_b: तस्मात-सर्वाणि भूतानि * न त्वं शोचि-तु-मर्हसि ॥ 2.30 ॥

S.no. 31  |  shpid: 31 |  id: 92 |  shlok#: 31 | utid: 3
   verse_a: स्व-धर्म-मपि चावेक्ष्य * न विकम्पि-तु-मर्हसि ।
   verse_b: धर्म्याद्धि युद्धा-च्छ्रेयोऽन्य * त्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ 2.31 ॥

S.no. 32  |  shpid: 32 |  id: 93 |  shlok#: 32 | utid: 3
   verse_a: यदृच्छया चोपपन्नां * स्वर्ग-द्वार-म-पावृतम्‌ ।
   verse_b: सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ * लभन्ते युद्ध-मी-दृशम्‌ ॥ 2.32 ॥

S.no. 33  |  shpid: 33 |  id: 94 |  shlok#: 33 | utid: 3
   verse_a: अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि ।
   verse_b: ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥2.33॥

S.no. 34  |  shpid: 34 |  id: 95 |  shlok#: 34 | utid: 3

S.no. 35  |  shpid: 35 |  id: 96 |  shlok#: 35 | utid: 3

S.no. 36  |  shpid: 36 |  id: 97 |  shlok#: 36 | utid: 3

S.no. 37  |  shpid: 37 |  id: 98 |  shlok#: 37 | utid: 3

S.no. 38  |  shpid: 38 |  id: 99 |  shlok#: 38 | utid: 3

S.no. 39  |  shpid: 39 |  id: 100 |  shlok#: 39 | utid: 3

S.no. 40  |  shpid: 40 |  id: 101 |  shlok#: 40 | utid: 3

S.no. 41  |  shpid: 41 |  id: 102 |  shlok#: 41 | utid: 3

S.no. 42  |  shpid: 42 |  id: 103 |  shlok#: 42 | utid: 3

S.no. 43  |  shpid: 43 |  id: 104 |  shlok#: 43 | utid: 3

S.no. 44  |  shpid: 44 |  id: 105 |  shlok#: 44 | utid: 3

S.no. 45  |  shpid: 45 |  id: 106 |  shlok#: 45 | utid: 3

S.no. 46  |  shpid: 46 |  id: 107 |  shlok#: 46 | utid: 3

S.no. 47  |  shpid: 47 |  id: 108 |  shlok#: 47 | utid: 3

S.no. 48  |  shpid: 48 |  id: 109 |  shlok#: 48 | utid: 3

S.no. 49  |  shpid: 49 |  id: 110 |  shlok#: 49 | utid: 3

S.no. 50  |  shpid: 50 |  id: 111 |  shlok#: 50 | utid: 3

S.no. 51  |  shpid: 51 |  id: 112 |  shlok#: 51 | utid: 3